मुझे इस बात का बिलकुल भी अंदाजा नही है की मनुष्य को सामाजिक प्राणी
क्यूँ माना जाता है l मेरे अब तक के निजी अनुभवों के आधार पर मैं यह पूर्ण
विश्वास के साथ कह सकता हूँ की मनुष्य विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक प्राणी
है l विवाद का विषय केवल इतना है की मनुष्य जाति राजनितिक अपने आस पास के
वातावरण के कारण बनी, या फिर राजनीतिक होना स्वाभाविक गुण है , उतना ही
स्वाभाविक जितना श्वास लेना ? इस प्रश्न से तो डार्विन भी पल्ला झाड गए l
मेरे अनुभव कम रहे हैं, मेरी सोच अपरिपक्व हो सकती है , लेकिन अपने विचारों पर मैं दृढ हूँ l हम हर एक कार्य को करने से पहले भली भाँती मूल्यांकन करते है, लाभ और हानि की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही किसी कार्य को अंजाम तक पहुचाने की इमानदार कोशिश की जाती हैl हमारी संवेदनशीलता केवल पाठ्य पुस्तकों में स्थान पाती है , जीवन के रण में हमारी क्रियाशीलता की मांग है , डिमांड है l
इस समस्या की जड़ मनुष्य का यह सोचना है की पृथ्वी के बाकी प्राणियों के अपेक्षा वह उच्चतर कोटि का हैl इस सोच ने घमंड को जन्म दिया, और झूठे शान को बरकरार रखने के लिए मनुष्य को क्रियाशील बनना पड़ाl भला वह इश्वर जिसे हम पूजते है न्याय का देवता मानते है, अपने ही प्राणियों के बीच भेद भाव क्यूँ करेगा? किसी को शक्ति कम दी तो, किसी को बुद्धि कम दी; बस इसलिए की प्रक्रति का संतुलन बना रहे सारे जीव आपसी तरंमयता के साथ जीवन बसर करें, परन्तु इंसानी सोच ने खुदाई ख्वाब को बर्बाद कर दिया l
फिर तो काबिल बनने की ऐसी दौड़ शुरू हुई, जो की बदस्तूर जारी हैl बाइबल में लिखा है की इश्वर ने मनुष्य को खुद के अंश से बनाया, इंसान इश्वर का बेटा हैl अगर ऐसा है तो हम नित प्रतिदिन संवेदनहीन क्यूँ होते जा रहे है ? सवाल उठता है की मनुष्य महत्वाकान्छी होता है , हर समय अपनी इन्द्रियों पर लगाम कसना आसान भी नही होताl ऐसे में संवेदनशीलता के रंग कैनवास पर कैसे छलके ? बाइबल इसका भी जवाब देती है -" तुम्हे वो मिलेगा जो तुम ढून्ढ रहे हो अगर तुम परमात्मा के सच्चे पुत्र हो l" हमने अपनी किताबों को इतना आराध्य बना दिया की उन्हें खोलने से डर लगने लगा l
आज हर कोई अपने बच्चों को काबिल बना रहा हैl सही भी हैl अगर कोई बहाव के विपरीत जा कर उन्हें संवेदनशील बनाएगा तो वो पृथ्वी पर इश्वर का सच्चा रूप तो होंगे , परन्तु हारे हुए योद्धा साबित होंगे l
इश्वर हार गया , मानव जीत कर भी हार गया l जीत हुई है तो बस झूठे शान की, शैतान की l
अर्जुन रामपाल ने सही ही कहा था- " तुम हर बरस रावण को इसीलिए जलाते हो क्यूंकि तुम जानते हो वो कभी नहीं मरता l "
मेरे अनुभव कम रहे हैं, मेरी सोच अपरिपक्व हो सकती है , लेकिन अपने विचारों पर मैं दृढ हूँ l हम हर एक कार्य को करने से पहले भली भाँती मूल्यांकन करते है, लाभ और हानि की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही किसी कार्य को अंजाम तक पहुचाने की इमानदार कोशिश की जाती हैl हमारी संवेदनशीलता केवल पाठ्य पुस्तकों में स्थान पाती है , जीवन के रण में हमारी क्रियाशीलता की मांग है , डिमांड है l
इस समस्या की जड़ मनुष्य का यह सोचना है की पृथ्वी के बाकी प्राणियों के अपेक्षा वह उच्चतर कोटि का हैl इस सोच ने घमंड को जन्म दिया, और झूठे शान को बरकरार रखने के लिए मनुष्य को क्रियाशील बनना पड़ाl भला वह इश्वर जिसे हम पूजते है न्याय का देवता मानते है, अपने ही प्राणियों के बीच भेद भाव क्यूँ करेगा? किसी को शक्ति कम दी तो, किसी को बुद्धि कम दी; बस इसलिए की प्रक्रति का संतुलन बना रहे सारे जीव आपसी तरंमयता के साथ जीवन बसर करें, परन्तु इंसानी सोच ने खुदाई ख्वाब को बर्बाद कर दिया l
फिर तो काबिल बनने की ऐसी दौड़ शुरू हुई, जो की बदस्तूर जारी हैl बाइबल में लिखा है की इश्वर ने मनुष्य को खुद के अंश से बनाया, इंसान इश्वर का बेटा हैl अगर ऐसा है तो हम नित प्रतिदिन संवेदनहीन क्यूँ होते जा रहे है ? सवाल उठता है की मनुष्य महत्वाकान्छी होता है , हर समय अपनी इन्द्रियों पर लगाम कसना आसान भी नही होताl ऐसे में संवेदनशीलता के रंग कैनवास पर कैसे छलके ? बाइबल इसका भी जवाब देती है -" तुम्हे वो मिलेगा जो तुम ढून्ढ रहे हो अगर तुम परमात्मा के सच्चे पुत्र हो l" हमने अपनी किताबों को इतना आराध्य बना दिया की उन्हें खोलने से डर लगने लगा l
आज हर कोई अपने बच्चों को काबिल बना रहा हैl सही भी हैl अगर कोई बहाव के विपरीत जा कर उन्हें संवेदनशील बनाएगा तो वो पृथ्वी पर इश्वर का सच्चा रूप तो होंगे , परन्तु हारे हुए योद्धा साबित होंगे l
इश्वर हार गया , मानव जीत कर भी हार गया l जीत हुई है तो बस झूठे शान की, शैतान की l
अर्जुन रामपाल ने सही ही कहा था- " तुम हर बरस रावण को इसीलिए जलाते हो क्यूंकि तुम जानते हो वो कभी नहीं मरता l "
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